श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.21

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

यस्मादण्डं विराड् जज्ञे भूतेन्द्रियगुणात्मकः६।

तद् द्रव्यमत्यगाद् विश्‍वं गोभिः सूर्य इवातपन्७॥ २१✎ 1877

yasmādaṇḍaṃ virāḍ jajñe bhūtendriyaguṇātmakaḥ|

tad dravyamatyagād viśvaṃ gobhiḥ sūrya ivātapan|| 21

अर्थ

जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे सबको प्रकाशित करते हुए भी सबसे अलग हैं, वैसे ही जिन परमात्मासे इस अण्डकी और पंचभूत, एकादश इन्द्रिय एवं गुणमय विराट्की उत्पत्ति हुई है—वे प्रभु भी इन समस्त वस्तुओंके अंदर और उनके रूपमें रहते हुए भी उनसे सर्वथा अतीत हैं॥ २१॥✎ 1582

टिप्पणियाँ

  1. ६

    प्रा० पा०—गुणाश्रयः।

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
  2. ७

    प्रा० पा०—इवातपत्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1582 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान् → पुरुषोत्तमभगवान्
  • #1877 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): मत्यगाद्विश्‍वं → मत्यगाद् विश्‍वं

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