श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सृती विचक्रमे विष्वङ् ५ साशनानशने उभे।

यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः॥ २०

sṛtī vicakrame viṣvaṅ sāśanānaśane ubhe|

yadavidyā ca vidyā ca puruṣastūbhayāśrayaḥ|| 20

अर्थ

शास्त्रोंमें दो मार्ग बतलाये गये हैं—एक अविद्यारूप कर्ममार्ग, जो सकाम पुरुषोंके लिये है और दूसरा उपासनारूप विद्याका मार्ग, जो निष्काम उपासकोंके लिये है। मनुष्य दोनोंमेंसे किसी एकका आश्रय लेकर भोग प्राप्त करानेवाले दक्षिणमार्गसे अथवा मोक्ष प्राप्त करानेवाले उत्तरमार्गसे यात्रा करता है; किन्तु पुरुषोत्तमभगवान् दोनोंके आधारभूत हैं॥ २०॥✎ 1582

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—विष्वक्।

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1582 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान् → पुरुषोत्तमभगवान्

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