वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं। अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक—शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं॥ ३६॥✎ 1293
स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक्।
नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः॥ ३६
वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं। अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक—शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 232) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/10/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1293 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विराट्-रूप → विराट्रूप