श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.36

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक्।

नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः॥ ३६

sa vācyavācakatayā bhagavān brahmarūpadhṛk|

nāmarūpakriyā dhatte sakarmākarmakaḥ paraḥ|| 36

अर्थ

वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं। अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक—शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं॥ ३६॥✎ 1293

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1293 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विराट्-रूप → विराट्रूप

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