श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.35

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अमुनी भगवद्रूपे मया ते अनुवर्णिते।

उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः॥ ३५

amunī bhagavadrūpe mayā te anuvarṇite|

ubhe api na gṛhṇanti māyāsṛṣṭe vipaścitaḥ|| 35

अर्थ

मैंने तुम्हें भगवान्‌के स्थूल और सूक्ष्म—व्यक्त और अव्यक्त जिन दो रूपोंका वर्णन सुनाया है, ये दोनों ही भगवान्‌की मायाके द्वारा रचित हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष इन दोनोंको ही स्वीकार नहीं करते॥ ३५॥✎ 181

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #181 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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