॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.1.23
श्रीशुक उवाच
जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः।
स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया॥ २३
jitāsano jitaśvāso jitasaṅgo jitendriyaḥ|
sthūle bhagavato rūpe manaḥ sandhārayeddhiyā|| 23
अर्थ
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! आसन, श्वास, आसक्ति और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके फिर बुद्धिके द्वारा मनको भगवान्के स्थूलरूपमें लगाना चाहिये॥ २३॥ यह कार्यरूप सम्पूर्ण विश्व जो कुछ कभी था, है या होगा—सब-का-सब जिसमें दीख पड़ता है वही भगवान्का स्थूल-से-स्थूल और विराट् शरीर है॥ २४॥