श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.21

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः।

आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः॥ २१

yasyāṃ sandhāryamāṇāyāṃ yogino bhaktilakṣaṇaḥ|

āśu sampadyate yoga āśrayaṃ bhadramīkṣataḥ|| 21

अर्थ

धारणा स्थिर हो जानेपर ध्यानमें जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्)-को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाती है॥ २१॥✎ 116

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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