धारणा स्थिर हो जानेपर ध्यानमें जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्)-को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाती है॥ २१॥✎ 116
यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः।
आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः॥ २१
धारणा स्थिर हो जानेपर ध्यानमें जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्)-को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाती है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 183) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/1/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में