श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढं मन आत्मनः।

यच्छेद्धारणया धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम्॥ २०

rajastamobhyāmākṣiptaṃ vimūḍhaṃ mana ātmanaḥ|

yaccheddhāraṇayā dhīro hanti yā tatkṛtaṃ malam|| 20

अर्थ

यदि भगवान्‌का ध्यान करते समय मन रजोगुणसे विक्षिप्त या तमोगुणसे मूढ़ हो जाय तो घबराये नहीं। धैर्यके साथ योगधारणाके द्वारा उसे वशमें करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणोंके दोषोंको मिटा देती है॥ २०॥✎ 116

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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