श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.19

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्‍नेन चेतसा।

मनो निर्विषयं युक्‍त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत्।

पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति॥ १९

tatraikāvayavaṃ dhyāyedavyucchinnena cetasā|

mano nirviṣayaṃ yuktvā tataḥ kiñcana na smaret|

padaṃ tatparamaṃ viṣṇormano yatra prasīdati|| 19

अर्थ

स्थिर चित्तसे भगवान्‌के श्रीविग्रहमेंसे किसी एक अंगका ध्यान करे। इस प्रकार एक-एक अंगका ध्यान करते-करते विषय-वासनासे रहित मनको पूर्णरूपसे भगवान्‌में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषयका चिन्तन ही न हो। वही भगवान् विष्णुका परमपद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेमरूप आनन्दसे भर जाता है॥ १९॥✎ 116

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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