॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.9.8
तमेव चिन्तयन्नर्थमृषिः स्वाश्रम एव सः।
वसन्नग्न्यर्कसोमाम्बुभूवायुवियदात्मसु॥ ८
tameva cintayannarthamṛṣiḥ svāśrama eva saḥ|
vasannagnyarkasomāmbubhūvāyuviyadātmasu|| 8
अर्थ
मार्कण्डेय मुनि अपने आश्रमपर ही रहकर निरन्तर इस बातका चिन्तन करते रहते कि मुझे मायाके दर्शन कब होंगे। वे अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश एवं अन्तःकरणमें—और तो क्या, सर्वत्र भगवान्का ही दर्शन करते हुए मानसिक वस्तुओंसे उनका पूजन करते रहते। कभी-कभी तो उनके हृदयमें प्रेमकी ऐसी बाढ़ आ जाती कि वे उसके प्रवाहमें डूबने-उतराने लगते, उन्हें इस बातकी भी याद न रहती कि कब कहाँ किस प्रकार भगवान्की पूजा करनी चाहिये?॥ ८-९॥