॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.9.7
सूत उवाच
इतीडितोऽर्चितः काममृषिणा भगवान् मुने।
तथेति स स्मयन् प्रागाद् बदर्याश्रममीश्वरः॥ ७
itīḍito'rcitaḥ kāmamṛṣiṇā bhagavān mune|
tatheti sa smayan prāgād badaryāśramamīśvaraḥ|| 7
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब इस प्रकार मार्कण्डेय मुनिने भगवान् नर-नारायणकी इच्छानुसार स्तुति-पूजा कर ली एवं वरदान माँग लिया, तब उन्होंने मुसकराते हुए कहा—‘ठीक है, ऐसा ही होगा।’ इसके बाद वे अपने आश्रम बदरीवनको चले गये॥ ७॥