श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.48

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यं वै न वेद वितथाक्षपथैर्भ्रमद्धीः

सन्तं स्वखेष्वसुषु हृद्यपि दृक्पथेषु।

तन्माययाऽऽवृतमतिः स उ एव साक्षा-

दाद्यस्तवाखिलगुरोरुपसाद्य वेदम्॥ ४८

yaṃ vai na veda vitathākṣapathairbhramaddhīḥ

santaṃ svakheṣvasuṣu hṛdyapi dṛkpatheṣu|

tanmāyayā''vṛtamatiḥ sa u eva sākṣā-

dādyastavākhilagurorupasādya vedam|| 48

अर्थ

आप यद्यपि प्रत्येक जीवकी इन्द्रियों तथा उनके विषयोंमें, प्राणोंमें तथा हृदयमें भी विद्यमान हैं तो भी आपकी मायासे जीवकी बुद्धि इतनी मोहित हो जाती है—ढक जाती है कि वह निष्फल और झूठी इन्द्रियोंके जालमें फँसकर आपकी झाँकीसे वंचित हो जाता है। किन्तु सारे जगत‍्के गुरु तो आप ही हैं। इसलिये पहले अज्ञानी होनेपर भी जब आपकी कृपासे उसे आपके ज्ञान-भण्डार वेदोंकी प्राप्ति होती है, तब वह आपके साक्षात् दर्शन कर लेता है॥ ४८॥

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