श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.34

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

पद्माक्षमालामुत जन्तुमार्जनं

वेदं च साक्षात्तप एव रूपिणौ।

तपत्तडिद्वर्णपिशंगरोचिषा

प्रांशू दधानौ विबुधर्षभार्चितौ॥ ३४

padmākṣamālāmuta jantumārjanaṃ

vedaṃ ca sākṣāttapa eva rūpiṇau|

tapattaḍidvarṇapiśaṃgarociṣā

prāṃśū dadhānau vibudharṣabhārcitau|| 34

अर्थ

कमलगट्टेकी माला और जीवोंको हटानेके लिये वस्त्रकी कूँची भी रखे हुए थे। ब्रह्मा, इन्द्र आदिके भी पूज्य भगवान् नर-नारायण कुछ ऊँचे कदके थे और वेद धारण किये हुए थे। उनके शरीरसे चमकती हुई बिजलीके समान पीले-पीले रंगकी कान्ति निकल रही थी। वे ऐसे मालूम होते थे, मानो स्वयं तप ही मूर्तिमान् हो गया हो॥ ३४॥

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