श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.33

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तौ शुक्लकृष्णौ नवकञ्जलोचनौ

चतुर्भुजौ रौरववल्कलाम्बरौ।

पवित्रपाणी उपवीतकं त्रिवृत्

कमण्डलुं दण्डमृजुं च वैणवम्॥ ३३

tau śuklakṛṣṇau navakañjalocanau

caturbhujau rauravavalkalāmbarau|

pavitrapāṇī upavītakaṃ trivṛt

kamaṇḍaluṃ daṇḍamṛjuṃ ca vaiṇavam|| 33

अर्थ

उन दोनोंमें एकका शरीर गौरवर्ण था और दूसरेका श्याम। दोनोंके ही नेत्र तुरंतके खिले हुए कमलके समान कोमल और विशाल थे। चार-चार भुजाएँ थीं। एक मृगचर्म पहने हुए थे तो दूसरे वृक्षकी छाल। हाथोंमें कुश लिये हुए थे और गलेमें तीन-तीन सूतके यज्ञोपवीत शोभायमान थे। वे कमण्डलु और बाँसका सीधा दण्ड ग्रहण किये हुए थे॥ ३३॥

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