श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.19

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

व्यतिरेकान्वयो यस्य जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु।

मायामयेषु तद् ब्रह्म जीववृत्तिष्वपाश्रयः॥ १९

vyatirekānvayo yasya jāgratsvapnasuṣuptiṣu|

māyāmayeṣu tad brahma jīvavṛttiṣvapāśrayaḥ|| 19

अर्थ

जीवकी वृत्तियोंके तीन विभाग हैं—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति। जो इन अवस्थाओंमें इनके अभिमानी विश्‍व, तैजस और प्राज्ञके मायामय रूपोंमें प्रतीत होता है और इन अवस्थाओंसे परे तुरीयतत्त्वके रूपमें भी लक्षित होता है, वही ब्रह्म है; उसीको यहाँ ‘अपाश्रय’ शब्दसे कहा गया है॥ १९॥

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