श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.18

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

हेतुर्जीवोऽस्य सर्गादेरविद्याकर्मकारकः।

यं चानुशयिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे॥ १८

heturjīvo'sya sargāderavidyākarmakārakaḥ|

yaṃ cānuśayinaṃ prāhuravyākṛtamutāpare|| 18

अर्थ

पुराणोंके लक्षणमें ‘हेतु’ नामसे जिसका व्यवहार होता है, वह जीव ही है; क्योंकि वास्तवमें वही सर्ग-विसर्ग आदिका हेतु है और अविद्यावश अनेकों प्रकारके कर्मकलापमें उलझ गया है। जो लोग उसे चैतन्यप्रधानकी दृष्टिसे देखते हैं, वे उसे अनुशयी अर्थात् प्रकृतिमें शयन करनेवाला कहते हैं; और जो उपाधिकी दृष्टिसे कहते हैं, वे उसे अव्याकृत अर्थात् प्रकृतिरूप कहते हैं॥ १८॥

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