श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.77

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

हिरण्यनाभः कौसल्यः पौष्यंजिश्‍च सुकर्मणः।

शिष्यौ जगृहतुश्‍चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तमः॥ ७७

hiraṇyanābhaḥ kausalyaḥ pauṣyaṃjiśca sukarmaṇaḥ|

śiṣyau jagṛhatuścānya āvantyo brahmavittamaḥ|| 77

अर्थ

सुकर्माके शिष्य कोसलदेशनिवासी हिरण्यनाभ, पौष्यंजि और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आवन्त्यने उन शाखाओंको ग्रहण किया॥ ७७॥

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