atha ha bhagavaṃstava caraṇanalinayugalaṃ tribhuvanagurubhirvanditamahamayātayāmayajuḥkāma upasarāmīti|| 72||
अर्थ
भगवन्! आपके दोनों चरणकमल तीनों लोकोंके गुरु-सदृश महानुभावोंसे भी वन्दित हैं। मैंने आपके युगल चरणकमलोंकी इसलिये शरण ली है कि मुझे ऐसे यजुर्वेदकी प्राप्ति हो, जो अबतक किसीको न मिला हो॥ ७२॥
अथ ह भगवंस्तव चरणनलिनयुगलं त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयामयजुःकाम उपसरामीति॥ ७२॥
भगवन्! आपके दोनों चरणकमल तीनों लोकोंके गुरु-सदृश महानुभावोंसे भी वन्दित हैं। मैंने आपके युगल चरणकमलोंकी इसलिये शरण ली है कि मुझे ऐसे यजुर्वेदकी प्राप्ति हो, जो अबतक किसीको न मिला हो॥ ७२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.72 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 941) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/72/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (12)