अनुक्रमणिका द्वादश स्कन्ध अध्याय 6 श्लोक 71 ॥ श्रीहरिः ॥
यदु ह वाव विबुधर्षभ सवितरदस्तपत्यनुसवनमहरहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन भगवतः समभिधीमहि तपनमण्डलम्॥ ६८॥ य इह वाव स्थिरचरनिकराणां निजनिकेतनानां मनइन्द्रियासुगणाननात्मनः स्वयमात्मान्तर्यामी प्रचोदयति॥ ६९॥ य एवेमं लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगरग्रहगिलितं मृतकमिव विचेतनमवलोक्यानुकम्पया परमकारुणिक ईक्षयैवोत्थाप्याहरहरनुसवनं श्रेयसि स्वधर्माख्यात्मावस्थाने प्रवर्तयत्यवनिपतिरिवासाधूनां भयमुदीरयन्नटति॥ ७०॥ परित आशापालैस्तत्र तत्र कमलकोशाञ्जलिभिरुपहृतार्हणः॥ ७१॥ अथ ह भगवंस्तव चरणनलिनयुगलं त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयामयजुःकाम उपसरामीति॥ ७२॥ ✎ 976 1546 1547 1548 1549 1550 1551 1552 1553 1554 1555 1556
parita āśāpālaistatra tatra kamalakośāñjalibhirupahṛtārhaṇaḥ|| 71||
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चारों ओर सभी दिक्पाल स्थान-स्थानपर अपनी कमलकी कलीके समान अंजलियोंसे आपको उपहार समर्पित करते हैं॥ ७१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.71 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 941) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/71/
मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 941
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परित आशापालैस्तत्र तत्र कमलकोशाञ्जलिभिरुपहृतार्हणः॥ ७१॥
चारों ओर सभी दिक्पाल स्थान-स्थानपर अपनी कमलकी कलीके समान अंजलियोंसे आपको उपहार समर्पित करते हैं॥ ७१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.71 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 941) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/71/ इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (12) #976 शब्दोंके बीचका स्थान: यदुह → यदु ह #1546 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयाम- यजु:काम → त्रिभुवनगुरुभिर्वन्दितमहमयातयामयजुःकाम #1547 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: चरण- नलिनयुगलं → चरणनलिनयुगलं #1548 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कमलकोशाञ्जलिभि- रुपहृतार्हण:॥ → कमलकोशाञ्जलिभिरुपहृतार्हणः॥ #1549 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रवर्तय-त्यवनिपतिरिवासाधूनां → प्रवर्तयत्यवनिपतिरिवासाधूनां #1550 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ईक्षयैवोत्थाप्याहरह-रनुसवनं → ईक्षयैवोत्थाप्याहरहरनुसवनं #1551 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विचेतनमवलोक्यानु-कम्पया → विचेतनमवलोक्यानुकम्पया #1552 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगर-ग्रहगिलितं → लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगरग्रहगिलितं #1553 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मनइन्द्रियासुगणा-ननात्मन: → मनइन्द्रियासुगणाननात्मनः #1554 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्थिरचर-निकराणां → स्थिरचरनिकराणां #1555 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सवितरदस्तपत्यनुसवन-महरहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरित-वृजिनबीजावभर्जन → सवितरदस्तपत्यनुसवन-महरहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन #1556 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सवितरदस्तपत्यनुसवन-महरहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन → सवितरदस्तपत्यनुसवनमहरहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिनबीजावभर्जन