॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.6.37
सूत उवाच
समाहितात्मनो ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
हृद्याकाशादभून्नादो वृत्तिरोधाद् विभाव्यते॥ ३७
samāhitātmano brahman brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ|
hṛdyākāśādabhūnnādo vṛttirodhād vibhāvyate|| 37
अर्थ
सूतजीने कहा—ब्रह्मन्! जिस समय परमेष्ठी ब्रह्माजी पूर्वसृष्टिका ज्ञान सम्पादन करनेके लिये एकाग्रचित्त हुए, उस समय उनके हृदयाकाशसे कण्ठ-तालु आदि स्थानोंके संघर्षसे रहित एक अत्यन्त विलक्षण अनाहत नाद प्रकट हुआ। जब जीव अपनी मनोवृत्तियोंको रोक लेता है, तब उसे भी उस अनाहत नादका अनुभव होता है॥ ३७॥