श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.5.1

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीशुकदेवजीका अन्तिम उपदेश

श्रीशुक उवाच

अत्रानुवर्ण्यतेऽभीक्ष्णं विश्‍वात्मा भगवान् हरिः।

यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रः क्रोधसमुद्भवः॥ १

atrānuvarṇyate'bhīkṣṇaṃ viśvātmā bhagavān hariḥ|

yasya prasādajo brahmā rudraḥ krodhasamudbhavaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—प्रिय परीक्षित्! इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें बार-बार और सर्वत्र विश्‍वात्मा भगवान् श्रीहरिका ही संकीर्तन हुआ है। ब्रह्मा और रुद्र भी श्रीहरिसे पृथक् नहीं हैं, उन्हींकी प्रसाद-लीला और क्रोध-लीलाकी अभिव्यक्ति हैं॥ १॥

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