श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.30

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नहि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते।

नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वातयोरिव॥ ३०

nahi satyasya nānātvamavidvān yadi manyate|

nānātvaṃ chidrayoryadvajjyotiṣorvātayoriva|| 30

अर्थ

परन्तु इतना तो सर्वथा निश्‍चित है कि परमार्थ-सत्य वस्तुमें नानात्व नहीं है। यदि कोई अज्ञानी परमार्थ-सत्य वस्तुमें नानात्व स्वीकार करता है, तो उसका वह मानना वैसा ही है, जैसा महाकाश और घटाकाशका, आकाशस्थित सूर्य और जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यका तथा बाह्य वायु और आन्तर वायुका भेद मानना॥ ३०॥

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