श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.29

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

विकारः ख्यायमानोऽपि प्रत्यगात्मानमन्तरा।

न निरूप्योऽस्त्यणुरपि स्याच्चेच्चित्सम आत्मवत्॥ २९

vikāraḥ khyāyamāno'pi pratyagātmānamantarā|

na nirūpyo'styaṇurapi syācceccitsama ātmavat|| 29

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि यह प्रपंचरूप विकार स्वाप्निक विकारके समान ही प्रतीत हो रहा है, तो भी यह अपने अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूप आत्मासे भिन्‍न नहीं है। कोई चाहे भी तो आत्मासे भिन्‍न रूपमें अणुमात्र भी इसका निरूपण नहीं कर सकता। यदि आत्मासे पृथक् इसकी सत्ता मानी भी जाय तो यह भी चिद्रूप आत्माके समान स्वयंप्रकाश होगा, और ऐसी स्थितिमें वह आत्माकी भाँति ही एकरूप सिद्ध होगा॥ २९॥

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