॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.25
बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति चोच्यते।
मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि॥ २५
buddherjāgaraṇaṃ svapnaḥ suṣuptiriti cocyate|
māyāmātramidaṃ rājan nānātvaṃ pratyagātmani|| 25
अर्थ
परीक्षित्! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धिकी ही हैं। अतः इनके कारण अन्तरात्मामें जो विश्व, तैजस और प्राज्ञरूप नानात्वकी प्रतीति होती है, वह केवल मायामात्र है। बुद्धिगत नानात्वका एकमात्र सत्य आत्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है॥ २५॥