॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.24
दीपश्चक्षुश्च रूपं च ज्योतिषो न पृथग् भवेत्।
एवं धीः खानि मात्राश्च न स्युरन्यतमादृतात्॥ २४
dīpaścakṣuśca rūpaṃ ca jyotiṣo na pṛthag bhavet|
evaṃ dhīḥ khāni mātrāśca na syuranyatamādṛtāt|| 24
अर्थ
जैसे दीपक, नेत्र और रूप—ये तीनों तेजसे भिन्न नहीं हैं, वैसे ही बुद्धि इन्द्रिय और इनके विषय तन्मात्राएँ भी अपने अधिष्ठान स्वरूप ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं यद्यपि वह इनसे सर्वथा भिन्न है; (जैसे रज्जुरूप अधिष्ठानमें अध्यस्त सर्प अपने अधिष्ठानसे पृथक् नहीं है, परन्तु अध्यस्त सर्पसे अधिष्ठानका कोई सम्बन्ध नहीं है)॥ २४॥