श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.15

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अपां रसमथो तेजस्ता लीयन्तेऽथ नीरसाः।

ग्रसते तेजसो रूपं वायुस्तद्रहितं तदा॥ १५

apāṃ rasamatho tejastā līyante'tha nīrasāḥ|

grasate tejaso rūpaṃ vāyustadrahitaṃ tadā|| 15

अर्थ

राजन्! इसके बाद जलके गुण रसको तेजस्तत्त्व ग्रस लेता है और जल नीरस होकर तेजमें समा जाता है। तदनन्तर वायु तेजके गुण रूपको ग्रस लेता है और तेज रूपरहित होकर वायुमें लीन हो जाता है। अब आकाश वायुके गुण स्पर्शको अपनेमें मिला लेता है और वायु स्पर्शहीन होकर आकाशमें शान्त हो जाता है। इसके बाद तामस अहंकार आकाशके गुण शब्दको ग्रस लेता है और आकाश शब्दहीन होकर तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इसी प्रकार तैजस अहंकार इन्द्रियोंको और वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवता और इन्द्रियवृत्तियोंको अपनेमें लीन कर लेता है॥ १५—१७॥

यह अर्थ श्लोक 15–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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