श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.14

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तदा भूमेर्गन्धगुणं ग्रसन्त्याप उदप्लवे।

ग्रस्तगन्धा तु पृथिवी प्रलयत्वाय कल्पते॥ १४

tadā bhūmergandhaguṇaṃ grasantyāpa udaplave|

grastagandhā tu pṛthivī pralayatvāya kalpate|| 14

अर्थ

इस प्रकार जब जल-प्रलय हो जाता है, तब जल पृथ्वीके विशेष गुण गन्धको ग्रस लेता है—अपनेमें लीन कर लेता है। गन्ध गुणके जलमें लीन हो जानेपर पृथ्वीका प्रलय हो जाता है, वह जलमें घुल-मिलकर जलरूप बन जाती है॥ १४॥

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