श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.47

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यथा हेम्‍नि स्थितो वह्निर्दुर्वर्णं हन्ति धातुजम्।

एवमात्मगतो विष्णुर्योगिनामशुभाशयम्॥ ४७

yathā hemni sthito vahnirdurvarṇaṃ hanti dhātujam|

evamātmagato viṣṇuryogināmaśubhāśayam|| 47

अर्थ

जैसे सोनेके साथ संयुक्त होकर अग्‍नि उसके धातुसम्बन्धी मलिनता आदि दोषोंको नष्ट कर देती है, वैसे ही साधकोंके हृदयमें स्थित होकर भगवान् विष्णु उनके अशुभ संस्कारोंको सदाके लिये मिटा देते हैं॥ ४७॥

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