॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.3.46
श्रुतः संकीर्तितो ध्यातः पूजितश्चादृतोऽपि वा।
नृणां धुनोति भगवान् हृत्स्थो जन्मायुताशुभम्॥ ४६
śrutaḥ saṃkīrtito dhyātaḥ pūjitaścādṛto'pi vā|
nṛṇāṃ dhunoti bhagavān hṛtstho janmāyutāśubham|| 46
अर्थ
भगवान्के रूप, गुण, लीला, धाम और नामके श्रवण, संकीर्तन, ध्यान, पूजन और आदरसे वे मनुष्यके हृदयमें आकर विराजमान हो जाते हैं। और एक-दो जन्मके पापोंकी तो बात ही क्या, हजारों जन्मोंके पापके ढेर-के-ढेर भी क्षणभरमें भस्म कर देते हैं॥ ४६॥