॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.3.35
पणयिष्यन्ति वै क्षुद्राः किराटाः कूटकारिणः।
अनापद्यपि मंस्यन्ते वार्तां साधुजुगुप्सिताम्॥ ३५
paṇayiṣyanti vai kṣudrāḥ kirāṭāḥ kūṭakāriṇaḥ|
anāpadyapi maṃsyante vārtāṃ sādhujugupsitām|| 35
अर्थ
व्यापारियोंके हृदय अत्यन्त क्षुद्र हो जाते हैं। वे कौड़ी—कौड़ीसे लिपटे रहते और छदाम-छदामके लिये धोखाधड़ी करने लगते हैं। और तो क्या—आपत्तिकाल न होनेपर तथा धनी होनेपर भी वे निम्नश्रेणीके व्यापारोंको, जिनकी सत्पुरुष निन्दा करते हैं, ठीक समझने और अपनाने लगते हैं॥ ३५॥✎ 1454