श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.33

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अव्रता वटवोऽशौचा भिक्षवश्‍च कुटुम्बिनः।

तपस्विनो ग्रामवासा न्यासिनोऽत्यर्थलोलुपाः॥ ३३

avratā vaṭavo'śaucā bhikṣavaśca kuṭumbinaḥ|

tapasvino grāmavāsā nyāsino'tyarthalolupāḥ|| 33

अर्थ

ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्यव्रतसे रहित और अपवित्र रहने लगते हैं। गृहस्थ दूसरोंको भिक्षा देनेके बदले स्वयं भीख माँगने लगते हैं, वानप्रस्थी गाँवोंमें बसने लगते हैं और संन्यासी धनके अत्यन्त लोभी—अर्थपिशाच हो जाते हैं॥ ३३॥✎ 1454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1454 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हैें॥ → हैं॥

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