श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.2

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

काम एष नरेन्द्राणां मोघः स्याद् विदुषामपि।

येन फेनोपमे पिण्डे येऽतिविश्रम्भिता नृपाः॥ २

kāma eṣa narendrāṇāṃ moghaḥ syād viduṣāmapi|

yena phenopame piṇḍe ye'tiviśrambhitā nṛpāḥ|| 2

अर्थ

राजाओंसे यह बात छिपी नहीं है कि वे एक-न-एक दिन मर जायँगे, फिर भी वे व्यर्थमें ही मुझे जीतनेकी कामना करते हैं। सचमुच इस कामनासे अंधे होनेके कारण ही वे पानीके बुलबुलेके समान क्षणभंगुर शरीरपर विश्‍वास कर बैठते हैं और धोखा खाते हैं॥ २॥

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