॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.3.1
अथ तृतीयोऽध्यायः
राज्य, युगधर्म और कलियुगके दोषोंसे बचनेका उपाय—नामसंकीर्तन
श्रीशुक उवाच
दृष्ट्वाऽऽत्मनि जये व्यग्रान् नृपान् हसति भूरियम्।
अहो मा विजिगीषन्ति मृत्योः क्रीडनका नृपाः॥ १
dṛṣṭvā''tmani jaye vyagrān nṛpān hasati bhūriyam|
aho mā vijigīṣanti mṛtyoḥ krīḍanakā nṛpāḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पृथ्वी देखती है कि राजा लोग मुझपर विजय प्राप्त करनेके लिये उतावले हो रहे हैं, तब वह हँसने लगती है और कहती है—‘‘कितने आश्चर्यकी बात है कि ये राजा लोग, जो स्वयं मौतके खिलौने हैं, मुझे जीतना चाहते हैं॥ १॥