॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.13.3
पुराणसंख्यासम्भूतिमस्य वाच्यप्रयोजने।
दानं दानस्य माहात्म्यं पाठादेश्च निबोधत॥ ३
purāṇasaṃkhyāsambhūtimasya vācyaprayojane|
dānaṃ dānasya māhātmyaṃ pāṭhādeśca nibodhata|| 3
अर्थ
शौनकजी! अब पुराणोंकी अलग-अलग श्लोक-संख्या, उनका जोड़, श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय और उसका प्रयोजन भी सुनिये। इसके दानकी पद्धति तथा दान और पाठ आदिकी महिमा भी आपलोग श्रवण कीजिये॥ ३॥ ब्रह्मपुराणमें दस हजार श्लोक, पद्मपुराणमें पचपन हजार, श्रीविष्णुपुराणमें तेईस हजार और शिवपुराणकी श्लोकसंख्या चौबीस हजार है॥ ४॥ श्रीमद्भागवतमें अठारह हजार, नारदपुराणमें पचीस हजार, मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा अग्निपुराणमें पन्द्रह हजार चार सौ श्लोक हैं॥ ५॥ भविष्यपुराणकी श्लोक-संख्या चौदह हजार पाँच सौ है और ब्रह्मवैवर्तपुराणकी अठारह हजार तथा लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं॥ ६॥ वराहपुराणमें चौबीस हजार, स्कन्द-पुराणकी श्लोक-संख्या इक्यासी हजार एक सौ है और वामनपुराणकी दस हजार॥ ७॥ कूर्मपुराण सत्रह हजार श्लोकोंका और मत्स्यपुराण चौदह हजार श्लोकोंका है। गरुड़पुराणमें उन्नीस हजार श्लोक हैं और ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार॥ ८॥ इस प्रकार सब पुराणोंकी श्लोकसंख्या कुल मिलाकर चार लाख होती है। उनमें श्रीमद्भागवत, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अठारह हजार श्लोकोंका है॥ ९॥