यह श्रीमद्भागवत समस्त उपनिषदोंका सार है। जो इस रस-सुधाका पान करके छक चुका है, वह किसी और पुराण-शास्त्रमें रम नहीं सकता॥ १५॥✎ 1457
सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते।
तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित्॥ १५
यह श्रीमद्भागवत समस्त उपनिषदोंका सार है। जो इस रस-सुधाका पान करके छक चुका है, वह किसी और पुराण-शास्त्रमें रम नहीं सकता॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.13.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 981) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/13/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1457 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणके → श्रीमद्भागवतमहापुराणके