॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.12.53
यशःश्रियामेव परिश्रमः परो
वर्णाश्रमाचारतपःश्रुतादिषु ।
अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्मयो-
र्गुणानुवादश्रवणादिभिर्हरेः ॥ ५३
yaśaḥśriyāmeva pariśramaḥ paro
varṇāśramācāratapaḥśrutādiṣu |
avismṛtiḥ śrīdharapādapadmayo-
rguṇānuvādaśravaṇādibhirhareḥ || 53
अर्थ
वर्णाश्रमके अनुकूल आचरण, तपस्या और अध्ययन आदिके लिये जो बहुत बड़ा परिश्रम किया जाता है, उसका फल है—केवल यश अथवा लक्ष्मीकी प्राप्ति। परन्तु भगवान्के गुण, लीला, नाम आदिका श्रवण, कीर्तन आदि तो उनके श्रीचरणकमलोंकी अविचल स्मृति प्रदान करता है॥ ५३॥