श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.12.52

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं

न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम्।

कुतः पुनः शश्‍वदभद्रमीश्‍वरे

न ह्यर्पितं कर्म यदप्यनुत्तमम्॥ ५२

naiṣkarmyamapyacyutabhāvavarjitaṃ

na śobhate jñānamalaṃ niraṃjanam|

kutaḥ punaḥ śaśvadabhadramīśvare

na hyarpitaṃ karma yadapyanuttamam|| 52

अर्थ

वह निर्मल ज्ञान भी, जो मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन है, यदि भगवान्‌की भक्तिसे रहित हो तो उसकी उतनी शोभा नहीं होती। फिर जो कर्म भगवान्‌को अर्पण नहीं किया गया है—वह चाहे कितना ही ऊँचा क्यों न हो—सर्वदा अमंगलरूप, दुःख देनेवाला ही है; वह तो शोभन—वरणीय हो ही कैसे सकता है?॥ ५२॥

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