श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.12.18

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

त्वाष्ट्रस्य जन्म निधनं पुत्रयोश्‍च दितेर्द्विजाः।

दैत्येश्‍वरस्य चरितं प्रह्रादस्य महात्मनः॥ १८ ✎ 1251

tvāṣṭrasya janma nidhanaṃ putrayośca diterdvijāḥ|

daityeśvarasya caritaṃ prahrādasya mahātmanaḥ|| 18

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! छठे स्कन्धमें ये विषय आये हैं—प्रचेताओंसे दक्षकी उत्पत्ति; दक्ष-पुत्रियोंकी सन्तान देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पर्वत और पक्षियोंका जन्म-कर्म; वृत्रासुरकी उत्पत्ति और उसकी परम गति। (अब सातवें स्कन्धके विषय बतलाये जाते हैं—) इस स्कन्धमें मुख्यतः दैत्यराज हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षके जन्म-कर्म एवं दैत्यशिरोमणि महात्मा प्रह्लादके उत्कृष्ट चरित्रका निरूपण है॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1251 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रहृदस्य → प्रह्रादस्य

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