॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.11.2
तान्त्रिकाः परिचर्यायां केवलस्य श्रियः पतेः।
अंगोपांगायुधाकल्पं कल्पयन्ति यथा च यैः॥ २
tāntrikāḥ paricaryāyāṃ kevalasya śriyaḥ pateḥ|
aṃgopāṃgāyudhākalpaṃ kalpayanti yathā ca yaiḥ|| 2
अर्थ
हमलोग क्रियायोगका यथावत् ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं; क्योंकि उसका कुशलतापूर्वक ठीक-ठीक आचरण करनेसे मरणधर्मा पुरुष अमरत्व प्राप्त कर लेता है। अतः आप हमें यह बतलाइये कि पांचरात्रादि तन्त्रोंकी विधि जाननेवाले लोग केवल श्रीलक्ष्मीपति भगवान्की आराधना करते समय किन-किन तत्त्वोंसे उनके चरणादि अंग, गरुडादि उपांग, सुदर्शनादि आयुध और कौस्तुभादि आभूषणोंकी कल्पना करते हैं? भगवान् आपका कल्याण करें॥ २-३॥