श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.11

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स्वमायां वनमालाख्यां नानागुणमयीं दधत्।

वासश्छन्दोमयं पीतं ब्रह्मसूत्रं त्रिवृत् स्वरम्॥ ११

svamāyāṃ vanamālākhyāṃ nānāguṇamayīṃ dadhat|

vāsaśchandomayaṃ pītaṃ brahmasūtraṃ trivṛt svaram|| 11

अर्थ

वे अपनी सत्त्व, रज आदि गुणोंवाली मायाको वनमालाके रूपसे, छन्दको पीताम्बरके रूपसे तथा अ+उ+म्—इन तीन मात्रावाले प्रणवको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करते हैं॥ ११॥

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