श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.38

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सूत उवाच

एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात्त्र्यक्ष ईश्‍वरः।✎ 2157

देव्यै तत्कर्म कथयन्‍ननुभूतं पुरामुना॥ ३८

evaṃ varān sa munaye dattvāgāttryakṣa īśvaraḥ|

devyai tatkarma kathayannanubhūtaṃ purāmunā|| 38

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार त्रिलोचन भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिको वर देकर भगवती पार्वतीसे मार्कण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलयसम्बन्धी अनुभवोंका वर्णन करते हुए वहाँसे चले गये॥ ३८॥✎ 1785

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1785 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनादि-कालसे → अनादिकालसे
  • #2157 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): गात्त्रॺक्ष → गात्त्र्यक्ष

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