श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.37

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

ज्ञानं त्रैकालिकं ब्रह्मन् विज्ञानं च विरक्तिमत्।

ब्रह्मवर्चस्विनो भूयात् पुराणाचार्यतास्तु ते॥ ३७

jñānaṃ traikālikaṃ brahman vijñānaṃ ca viraktimat|

brahmavarcasvino bhūyāt purāṇācāryatāstu te|| 37

अर्थ

ब्रह्मन्! तुम्हारा ब्रह्मतेज तो सर्वदा अक्षुण्ण रहेगा ही। तुम्हें भूत, भविष्य और वर्तमानके समस्त विशेष ज्ञानोंका एक अधिष्ठानरूप ज्ञान और वैराग्ययुक्त स्वरूपस्थितिकी प्राप्ति हो जाय। तुम्हें पुराणका आचार्यत्व भी प्राप्त हो॥ ३७॥

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