श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.28

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

ऋषिरुवाच

अहो ईश्‍वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम्।

यन्‍नमन्तीशितव्यानि स्तुवन्ति जगदीश्‍वराः॥ २८

aho īśvaralīleyaṃ durvibhāvyā śarīriṇām|

yannamantīśitavyāni stuvanti jagadīśvarāḥ|| 28

अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा—सचमुच सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की यह लीला सभी प्राणियोंकी समझके परे है। भला, देखो तो सही—ये सारे जगत‍्के स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले मेरे-जैसे जीवोंकी वन्दना और स्तुति करते हैं॥ २८॥

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