श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.27

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स चिरं मायया विष्णोर्भ्रामितः कर्शितो भृशम्।

शिववागमृतध्वस्तक्लेशपुंजस्तमब्रवीत्॥ २७

sa ciraṃ māyayā viṣṇorbhrāmitaḥ karśito bhṛśam|

śivavāgamṛtadhvastakleśapuṃjastamabravīt|| 27

अर्थ

वे चिरकालतक विष्णुभगवान्‌की मायासे भटक चुके थे और बहुत थके हुए भी थे। भगवान् शिवकी कल्याणी वाणीका अमृतपान करनेसे उनके सारे क्लेश नष्ट हो गये। उन्होंने भगवान् शंकरसे इस प्रकार कहा॥ २७॥

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