हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज राजा यदु अवधूत दत्तात्रेयकी यह बात सुनकर समस्त आसक्तियोंसे छुटकारा पा गये और समदर्शी हो गये। (इसी प्रकार तुम्हें भी समस्त आसक्तियोंका परित्याग करके समदर्शी हो जाना चाहिये)॥ ३३॥
अवधूतवचः श्रुत्वा पूर्वेषां नः स पूर्वजः।
सर्वसंगविनिर्मुक्तः समचित्तो बभूव ह॥ ३३
हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज राजा यदु अवधूत दत्तात्रेयकी यह बात सुनकर समस्त आसक्तियोंसे छुटकारा पा गये और समदर्शी हो गये। (इसी प्रकार तुम्हें भी समस्त आसक्तियोंका परित्याग करके समदर्शी हो जाना चाहिये)॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.9.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 774) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/9/33/