श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

न ह्येकस्माद् गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात् सुपुष्कलम्।

ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभिः॥ ३१

na hyekasmād gurorjñānaṃ susthiraṃ syāt supuṣkalam|

brahmaitadadvitīyaṃ vai gīyate bahudharṣibhiḥ|| 31

अर्थ

राजन्! अकेले गुरुसे ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता, उसके लिये अपनी बुद्धिसे भी बहुत कुछ सोचने-समझनेकी आवश्यकता है। देखो! ऋषियोंने एक ही अद्वितीय ब्रह्मका अनेकों प्रकारसे गान किया है। (यदि तुम स्वयं विचारकर निर्णय न करोगे तो ब्रह्मके वास्तविक स्वरूपको कैसे जान सकोगे?)॥ ३१॥

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