श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

कियत् प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नराः।

आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुताः॥ ३६

kiyat priyaṃ te vyabhajan kāmā ye kāmadā narāḥ|

ādyantavanto bhāryāyā devā vā kālavidrutāḥ|| 36

अर्थ

मेरे मूर्ख चित्त! तू बतला तो सही, जगत‍्के विषयभोगोंने और उनको देनेवाले पुरुषोंने तुझे कितना सुख दिया है। अरे! वे तो स्वयं ही पैदा होते और मरते रहते हैं। मैं केवल अपनी ही बात नहीं कहती, केवल मनुष्योंकी भी नहीं; क्या देवताओंने भी भोगोंके द्वारा अपनी पत्‍नियोंको सन्तुष्ट किया है? वे बेचारे तो स्वयं कालके गालमें पड़े-पड़े कराह रहे हैं॥ ३६॥✎ 1740

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1740 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शान्ति-लाभ → शान्तिलाभ

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