॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.8.35
सुहृत् प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्।
तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा॥ ३५
suhṛt preṣṭhatamo nātha ātmā cāyaṃ śarīriṇām|
taṃ vikrīyātmanaivāhaṃ rame'nena yathā ramā|| 35
अर्थ
मेरे हृदयमें विराजमान प्रभु, समस्त प्राणियोंके हितैषी, सुहृद्, प्रियतम, स्वामी और आत्मा हैं। अब मैं अपने-आपको देकर इन्हें खरीद लूँगी और इनके साथ वैसे ही विहार करूँगी, जैसे लक्ष्मीजी करती हैं॥ ३५॥✎ 1740