श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान् पुरुषर्षभ।

ताञ्छुल्कदान् वित्तवतः कान्तान् मेनेऽर्थकामुका॥ २४

mārga āgacchato vīkṣya puruṣān puruṣarṣabha|

tāñchulkadān vittavataḥ kāntān mene'rthakāmukā|| 24

अर्थ

नररत्‍न! उसे पुरुषकी नहीं, धनकी कामना थी और उसके मनमें यह कामना इतनी दृढ़मूल हो गयी थी कि वह किसी भी पुरुषको उधरसे आते-जाते देखकर यही सोचती कि यह कोई धनी है और मुझे धन देकर उपभोग करनेके लिये ही आ रहा है॥ २४॥

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