श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ग्राम्यगीतं न शृणुयाद् यतिर्वनचरः क्‍वचित्।

शिक्षेत हरिणाद् बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात्॥ १७

grāmyagītaṃ na śṛṇuyād yatirvanacaraḥ kvacit|

śikṣeta hariṇād baddhānmṛgayorgītamohitāt|| 17

अर्थ

मैंने हरिनसे यह सीखा है कि वनवासी संन्यासीको कभी विषय-सम्बन्धी गीत नहीं सुनने चाहिये। वह इस बातकी शिक्षा उस हरिनसे ग्रहण करे जो व्याधके गीतसे मोहित होकर बँध जाता है॥ १७॥

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