॥ श्रीहरिः ॥
त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।
मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग् विचरस्व गाम्॥ ६
tvaṃ tu sarvaṃ parityajya snehaṃ svajanabandhuṣu|
mayyāveśya manaḥ samyak samadṛg vicarasva gām|| 6
अर्थ
अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो॥ ६॥
त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।
मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग् विचरस्व गाम्॥ ६
अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 752) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/6/